आलेख

एक बार एक अजनबी किसी के घर गया। वह अंदर गया और मेहमान कक्ष में बैठ गया क्योंकि वह खाली हाथ आया था तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा । उसने वहाँ टंगी एक पेन्टिंग उतारी और जब घर का मालिक आया तो अपनी ओर से शिष्टाचार निभाते हुए उसने वह पेन्टिंग देते हुए कहा, यह मै आपके लिए लाया हूँ। घर का मालिक, जिसे पता था कि यह मेरी चीज़ मुझे ही भेंट दे रहा है, सन्न रह गया । अब आप ही बताएँ कि क्या वह भेंट पा कर, जो कि पहले से ही उसकी है, उस आदमी को खुश होना चाहिए? मेरे ख्याल से नहीं। शायद आपके विचार से भी इसका उत्तर ना में ही होगा। *यही काम हम भगवान के साथ भी करते हैं। हम उन्हें रुपया, पैसा और अन्य भेंट भी चढ़ाते हैं और हर चीज़ जो उनकी ही बनाई है, उन्हें ही भेंट करते हैं और मन में भाव रखते हैं कि यह चीज़ मैं भगवान को दे रहा हूँ और सोचते हैं कि ईश्वर खुश हो जाएंगे।* *मूर्ख हैं हम।* हम यह नहीं समझते कि उनको इन सब चीज़ों की कोई ज़रूरत नहीं, *अगर आप सच में उन्हें कुछ देना चाहते हैं तो अपनी श्रद्धा दीजिए, उन्हें अपने हर एक श्वांस में याद कीजिये और विश्वास कीजिए, प्रभु ज़रूर खुश होंगे।* *अजब हैरान हूँ भगवन्,* *तुझे कैसे रिझाऊं मैं,* *कोई वस्तु नहीं ऐसी,* *जिसे तुझ पर चढ़ाऊँ मैं।* *भगवान ने जवाब दिया :* संसार की हर वस्तु तुझे मैंने दी है। तेरे पास अपनी चीज़ सिर्फ़ *तेरा अहंकार* है, जो मैंने तुझे नहीं दिया। *तू उसको मुझे अर्पण कर दे* फिर देखना *तेरा जीवन सफल हो जायेगा।*
पापा पापा मुझे चोट लग गई खून आ रहा है 5 साल के बच्चे के मुँह से सुनना था कि पापा सब कुछ छोड़ छाड़ कर गोदी में उठाकर एक किलो मीटर की दूरी पर क्लिनिक तक भाग भाग कर ही पहुँच गए दुकान कैश काउंटर सब नौकर के भरोसे छोड़ आये सीधा डाक्टर के केबिन में दाखिल होते हुए डॉक्टर को बोले देखिये देखिये डॉक्टर मेरे बेटे को क्या हो गया डॉक्टर साहब ने देखते हुए कहा अरे भाई साहब घबराने की कोई बात है मामूली चोट है.... ड्रेसिंग कर दी है ठीक हो जायेगी। डॉक्टर साहब कुछ पेन किलर लिख देते दर्द कम हो जाता । अच्छी से अच्छी दवाईया लिख देते ताकि जल्दी ठीक हो जाये घाव भर जाये *डाक्टर* अरे भाई साहब क्यों इतने चिंतित हो रहे हो कुछ नहीं हुआ है 3-4दिन में ठीक हो जायेगा पर डॉक्टर साहब इसको रात को नींद तो आजायेगी ना । *डॉक्टर* अरे हाँ भाई हाँ निश्चित रहो । बच्चे को लेकर लौटे तो नौकर बोला सेठ जी आपका ब्रांडेड महंगा शर्ट खराब हो गया खून लग गया अब ये दाग नही निकलेंगे *भाई साहब* कोई नहीं ऐसे शर्ट बहुत आएंगे जायेंगे मेरे बेटे का खून बह गया वो चिंता खाये जा रही है कमजोर नहीं हो जाये । तू जा एक काम कर थोड़े सूखे मेवे फ्रूट ले आ इसे खिलाना पड़ेगा और दुकान तुम मंगल कर लेना मैं चलता हूँ घर पर *40 साल बाद* दुकान शोरूम में तब्दील हो गई है भाई साहब का बेटा बिज़नस बखूबी संभाल रहा है भाई साहब रिटायर्ड हो चुके हैं घर पर ही रहते है तभी घर से बेटे की पत्नी का फोन आता है *पत्नी*📞अजी सुनते हो ये आपके पिताजी पलंग से गिर गए हैं सर पर से खून आ रहा है *लड़का*📱 अरे यार ये पिताजी भी न इनको बोला जमीन पर सो जाओ । सोते नही पलंग पर ही सोते है अरे रामू काका जाओ तो घर पर पिताजी को डॉक्टर अंकल के पास ले कर आओ मैं मिलता हूँ वहीँ । बूढ़े हो चुके रामू काका चल कर धीरे धीरे घर जाते है तब तक सेठजी का काफी खून बह चुका था बहु मुँह चढ़ा कर बोली ले जाओ जल्दी पूरा महंगा कालीन खराब हो गया है रामू काका जैसे तैसे तेज़ साइकिल रिक्शा में सेठजी को डाल कर क्लीनिक ले गए बेटा अब तक नही पंहुचा था रामू काका ने फोन किया तो बोला अरे यार वो कार की चाबी नही मिल रहा थी अभी मिली है थोड़े कस्टमर भी है आप बैठो लेकर मैं आता हूँ जो दूरी 40 साल पहले एक बाप ने बेटे के सर पर खून देखकर 10 मिनट में बेटे को गोदी में उठा कर भाग कर तय कर ली थी बेटा 1घन्टा 10 मिनट में कार से भी तय नही कर पाया था डाक्टर ने जैसे ही भाई साहब को देखा उनको अंदर ले गए इलाज चालू किया तब तक बेटा भी पहुँच गया डॉक्टर अंकल बोले बेटे खून बहुत बह गया है एडमिट कर देते तो ठीक रहता *बेटा* अरे कुछ नही डाक्टर साहब आप ड्रेसिंग कर दो ठीक हो जायेगा 2-4 दिन में । डाक्टर अंकल बोले ठीक है कुछ दवाईया लिख देता हूँ थोड़ी महंगी है लेकिन आराम जल्दी हो जायेगा *लड़का* अरे डॉक्टर अंकल चलेगा 4-5 दिन ज्यादा लगेंगे तो अब इतनी महंगी दवाइयो की क्या जरूरत । चलो मुझे निकलना पड़ेगा शोरूम पर कोई नहीं है । ये सुनते ही डॉक्टर अंकल के सब्र का बांध टूट गया और 40 साल पहले की घटना पूरी सुनाई बेटे के आँख में अविरल अश्रु धारा बह रही थी तभी बहू का फोन आया वो महंगा कालीन खराब हो गया है क्या करूँ । बेटा बोला कालीन ही खराब हुआ है ना ..... नया आजायेगा तुम पलंग पर नया चद्दर और गद्दा डालो मैँ पिताजी को ले कर आ रहा हूँ भाई साहब के आँखों में आँसू थे और ये ख़ुशी के थे चोट का दर्द गायब था बेटे के अपनेपन ने सब भुला दिया। बस अब तो मौत भी आ जाये तो स्वीकार है । मित्रों ये आज की हकीकत है आज हमारे अंदर का इंसान मर चुका है । माँ बाप एकाकी जीवन जी रहे हैं और बेटा सफलता और दौलत की चकाचौंध में खो कर सब कुछ भूल चुका है । कहानी दिल को छुए तो दोस्तों को जरुर शेयर करे आत्मचिंतन करने योग्य है।
एक गांव में दो बुजुर्ग बातें कर रहे थे.... पहला :- मेरी एक पोती है, शादी के लायक है... BA किया है, नौकरी करती है, कद - 5"2 इंच है.. सुंदर है कोई लडका नजर मे हो तो बताइएगा.. दूसरा :- आपकी पोती को किस तरह का परिवार चाहिए...?? पहला :- कुछ खास नही.. बस लडका MA/M.TECH किया हो, अपना घर हो, कार हो, घर मे एसी हो, अपने बाग बगीचा हो, अच्छा job, अच्छी सैलरी, कोई लाख रू. तक हो... दूसरा :- और कुछ... पहला :- हाँ सबसे जरूरी बात.. अकेला होना चाहिए.. मां-बाप,भाई-बहन नही होने चाहिए.. वो क्या है लडाई झगड़े होते है... दूसरे बुजुर्ग की आँखें भर आई फिर आँसू पोछते हुए बोला - मेरे एक दोस्त का पोता है उसके भाई-बहन नही है, मां बाप एक दुर्घटना मे चल बसे, अच्छी नौकरी है, डेढ़ लाख सैलरी है, गाड़ी है बंगला है, नौकर-चाकर है.. पहला :- तो करवाओ ना रिश्ता पक्का.. दूसरा :- मगर उस लड़के की भी यही शर्त है की लडकी के भी मां-बाप,भाई-बहन या कोई रिश्तेदार ना हो... कहते कहते उनका गला भर आया.. फिर बोले :- अगर आपका परिवार आत्महत्या कर ले तो बात बन सकती है.. आपकी पोती की शादी उससे हो जाएगी और वो बहुत सुखी रहेगी.... पहला :- ये क्या बकवास है, हमारा परिवार क्यों करे आत्महत्या.. कल को उसकी खुशियों मे, दुःख मे कौन उसके साथ व उसके पास होगा... दूसरा :- वाह मेरे दोस्त, खुद का परिवार, परिवार है और दूसरे का कुछ नही... मेरे दोस्त अपने बच्चो को परिवार का महत्व समझाओ, घर के बडे ,घर के छोटे सभी अपनो के लिए जरूरी होते है... वरना इंसान खुशियों का और गम का महत्व ही भूल जाएगा, जिंदगी नीरस बन जाएगी... पहले वाले बुजुर्ग बेहद शर्मिंदगी के कारण कुछ नही बोल पाए... दोस्तों परिवार है तो जीवन मे हर खुशी, खुशी लगती है अगर परिवार नही तो किससे अपनी खुशियाँ और गम बांटोगे.... ......
आने वाले 10/15 साल में एक पीढ़ी, संसार छोड़ कर जाने वाली हैं। कड़वा है, लेकिन सत्य है। इस पीढ़ी के लोग बिलकुल अलग ही हैं... रात को जल्दी सोने वाले, सुबह जल्दी जागने वाले,भोर में घूमने निकलने वाले। आंगन और पौधों को पानी देने वाले, देवपूजा के लिए फूल तोड़ने वाले, पूजा अर्चना करने वाले, प्रतिदिन मंदिर जाने वाले। रास्ते में मिलने वालों से बात करने वाले, उनका सुख दु:ख पूछने वाले, दोनो हाथ जोड कर प्रणाम करने वाले, पूजा होये बगैर अन्नग्रहण न करने वाले। उनका अजीब सा संसार...... तीज त्यौहार, मेहमान शिष्टाचार, अन्न, धान्य, सब्जी, भाजी की चिंता तीर्थयात्रा, रीति रिवाज के इर्द गिर्द घूमने वाले। पुराने फोन पे ही मोहित, फोन नंबर की डायरियां मेंटेन करने वाले, रॉन्ग नम्बर से भी बात कर लेने वाले, समाचार पत्र को दिन भर में दो-तीन बार पढ़ने वाले। हमेशा एकादशी याद रखने वाले, अमावस्या और पुरमासी याद रखने वाले लोग, भगवान पर प्रचंड विश्वास रखनेवाले, समाज का डर पालने वाले, पुरानी चप्पल, बनियान, चश्मे वाले। गर्मियों में अचार पापड़ बनाने वाले, घर का कुटा हुआ मसाला इस्तेमाल करने वाले और हमेशा देशी टमाटर, बैंगन, मेथी, साग भाजी ढूंढने वाले। क्या आप जानते हैं..... ये सभी लोग धीरे धीरे, हमारा साथ छोड़ के जा रहे हैं। क्या आपके घर में भी ऐसा कोई है? यदि हाँ, तो उनका बेहद ख्याल रखें। अन्यथा एक महत्वपूर्ण सीख, उनके साथ ही चली जायेगी.....वो है, संतोषी जीवन, सादगीपूर्ण जीवन, प्रेरणा देने वाला जीवन, मिलावट और बनावट रहित जीवन, धर्म सम्मत मार्ग पर चलने वाला जीवन और सबकी फिक्र करने वाला आत्मीय जीवन। *संस्कार* ही *अपराध* रोक सकते हैं *सरकार* नहीं !
एक नगर के राजा ने यह घोषणा करवा दी कि कल जब मेरे महल का मुख्य दरवाज़ा खोला जायेगा.. तब जिस व्यक्ति ने जिस वस्तु को हाथ लगा दिया वह वस्तु उसकी हो जाएगी.. इस घोषणा को सुनकर सब लोग आपस में बातचीत करने लगे कि मैं अमुक वस्तु को हाथ लगाऊंगा.. कुछ लोग कहने लगे मैं तो स्वर्ण को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग कहने लगे कि मैं कीमती जेवरात को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग घोड़ों के शौक़ीन थे और कहने लगे कि मैं तो घोड़ों को हाथ लगाऊंगा, कुछ लोग हाथीयों को हाथ लगाने की बात कर रहे थे, कुछ लोग कह रहे थे कि मैं दुधारू गौओं को हाथ लगाऊंगा.. कल्पना कीजिये कैसा अद्भुत दृश्य होगा वह !! उसी वक्त महल का मुख्य दरवाजा खुला और सब लोग अपनी अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगाने दौड़े.. सबको इस बात की जल्दी थी कि पहले मैं अपनी मनपसंद वस्तु को हाथ लगा दूँ ताकि वह वस्तु हमेशा के लिए मेरी हो जाएँ और सबके मन में यह डर भी था कि कहीं मुझ से पहले कोई दूसरा मेरी मनपसंद वस्तु को हाथ ना लगा दे.. राजा अपने सिंघासन पर बैठा सबको देख रहा था और अपने आस-पास हो रही भाग दौड़ को देखकर मुस्कुरा रहा था.. उसी समय उस भीड़ में से एक छोटी सी लड़की आई और राजा की तरफ बढ़ने लगी.. राजा उस लड़की को देखकर सोच में पढ़ गया और फिर विचार करने लगा कि यह लड़की बहुत छोटी है शायद यह मुझसे कुछ पूछने आ रही है.. वह लड़की धीरे धीरे चलती हुई राजा के पास पहुंची और उसने अपने नन्हे हाथों से राजा को हाथ लगा दिया.. राजा को हाथ लगाते ही राजा उस लड़की का हो गया और राजा की प्रत्येक वस्तु भी उस लड़की की हो गयी.. . . जिस प्रकार उन लोगों को राजा ने मौका दिया था और उन लोगों ने गलती की.. ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी हमे हर रोज मौका देता है और हम हर रोज गलती करते है.. हम ईश्वर को पाने की बजाएँ ईश्वर की बनाई हुई संसारी वस्तुओं की कामना करते है और उन्हें प्राप्त करने के लिए यत्न करते है.. पर हम कभी इस बात पर विचार नहीं करते कि यदि ईश्वर हमारे हो गए तो उनकी बनाई हुई प्रत्येक वस्तु भी हमारी हो जाएगी.. ईश्वर को चाहना और ईश्वर से चाहना.. दोनों में बहुत अंतर है....
प्रत्येक मनुष्य को अपने जीवन में सुख और दुख का सामना करना ही पड़ता है जहां दुख होता है वहां एक दिन सुख की सुबह भी जरूर होती है और जहां सुख होता है वहां कभी न कभी दुख रूपी अंधेरे से सामना अवश्य होता है। वो सब हमें इस जन्म तथा पूर्व जन्म के कर्म और संस्कार के अनुरूप मिलता है। अक्सर हमने देखा है कि जब मनुष्य के जीवन में दुख का समय होता है तो वह बहुत जल्दी घबरा जाता है, परेशान हो जाता है। उसे लगता है कि मुझ से ज्यादा दुखी इस दुनिया में कोई है ही नहीं और वो सोचता है कि मै जीवन में बहुत दुखी हूँ क्योंकि मेरा जीवनसाथी मेरा साथ नहीं देता, मुझे रोग भी हैं, मेरी संतान मेरे अनुकूल नहीं चलती, मेरे पास सुख के साधन कम है, पैसा भी कम है, रोजगार भी कम है, समाज में नाम भी कम है। मुझे प्यार भी कम मिलता है, सारा दिन डरता रहता हूँ किसी भी भोग में आनंद नहीं आता, रात को ठीक से नींद भी नहीं आती। हर तरह से दुखी रहता हूँ। बहुत प्रयास करने पर भी अपनी कमी नहीं निकाल पाता हूँ। कभी कभी ज्ञानी का रूप धारण करके अपने पूर्वजन्मो के कर्मो के फलो को मानता हूँ। दूसरों के द्वारा किये कर्म मुझे दुःख देते प्रतीत होते हैं। कभी मुझे दूसरों का सुख और सफलता दुख देती प्रतीत होती है यही बात श्रीरामचरितमानस में विस्तार पूर्वक समझाई गयी है। आओ समझें। वनगमन होने के बाद वन में प्रभु श्री राम और माँ जानकी जमींन पर आनंद के साथ लेट गए और सोने लगे। प्रभु को जमींन पर सोते देखकर प्रेमवश निषादराज के ह्रदय में विषाद हो आया। उसका शरीर पुलकित हो गया और वह प्रेमसहित लक्ष्मणजी से वचन कहने लगा कि महाराज दशरथ का महल जो स्वभाव से ही सुंदर है, सुंदर तकिये और गद्दे हैं। जहाँ सुंदर पलंग और मणियो के दीपक हैं वही श्रीसीता और श्रीराम आज घास-फूस की साथरी पर थके हुए बिना वस्त्र के ही सोये हैं। कैकयी ने बड़ी कुटिलता की, वह सुर्यकुल्रूपी वृक्ष के किये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धि ने सारे विश्व को दुखी कर दिया। श्रीराम-सीता को जमींन पर सोते हुए देखकर निषाद को बड़ा दुःख हुआ। तब लक्ष्मणजी ज्ञान,वैराग्य और भक्ति के रस से सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले-- काऊ न कोऊ सुख दुख कर दाता, निज कृति कर्म भोग फल भ्राता। हे भाई! कोई किसी को सुख दुःख देने वाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मो का फल भोगते हैं। यहां विचार करने वाली बात है कि प्रभु श्रीराम और माँ जानकी ने इस जन्म अथवा पूर्व जन्मो में क्या कर्म किये होंगे जो इनको इतना दुःख सहना पड़ रहा है। यह विचार भी आता है कि श्री लक्ष्मण, प्रभु राम अथवा माता सीता में तो दोष निकाल ही नहीं सकते। तब लक्ष्मण जी ने यह क्यों कहा, कि सब अपने कर्मो का फल भोगते हैं तो अब यहां एक ही बात निकाल कर आती है, की लक्ष्मण जी किसको समझा रहे हैं, "निषाद राज को" रो कौन रहा है, दुखी कौन है? प्रभु राम और सीता माता तो सुख और आनंद के साथ कुश की शय्या पर सो रहें हैं दुखी तो निषादराज है और रो भी वही रहा है इसका अर्थ निषादराज आपके कर्म आपको दुःख दे रहे हैं। जो कोई भी व्यक्ति इस संसार में किसी भी तरह से दुखी है वह केवल अपने ही कर्मो का फल भोगता है किसी दुसरे के किये किसी भी प्रकार के कर्म उसके लिए दुःख और सुख का कारण नहीं बन सकते। 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️
एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो। एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया। आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, *"बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।"* कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, ' *यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।*' एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे। दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन करें। वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अंधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी। एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, ' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं। मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।" आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था। मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था, बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते। मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है। मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है। वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है। वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, ' कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि 'दहेज का सामान' के सामने लिखा हुआ था ' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।' काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।" वैद्यजी ने आगे कहा,सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो।
*एक बादशाह सर्दियों की शाम जब अपने महल में दाखिल हो रहा था तो एक बूढ़े दरबान को देखा जो महल के सदर दरवाज़े पर पुरानी और बारीक वर्दी में पहरा दे रहा था...बादशाह ने उसके करीब अपनी सवारी को रुकवाया और उस बूढ़े दरबान से पूछने लगा...* *"सर्दी नही लग रही ?"दरबान ने जवाब दिया....."बोहत लग रही है हुज़ूर ! मगर क्या करूँ,गर्म वर्दी है नही मेरे पास,इसलिए बर्दाश्त करना पड़ता है।"* *बादशाह ने कहा"मैं अभी महल के अंदर जाकर अपना ही कोई गर्म जोड़ा भेजता हूँ तुम्हे।"* *दरबान ने खुश होकर बादशाह को फर्शी सलाम किया और आजिज़ी का इज़हार किया,लेकिन......बादशाह जैसे ही महल में दाखिल हुआ, दरबान के साथ किया हुआ वादा भूल गया।सुबह दरवाज़े पर उस बूढ़े दरबान की अकड़ी हुई लाश मिली और करीब ही मिट्टी पर उसकी उंगलियों से लिखी गई* *ये शब्द थे,,,,बादशाह सलामत!मैं कई सालों से सर्दियों में इसी नाज़ुक वर्दी में दरबानी कर रहा था,मगर कल रात आप के गर्म लिबास के वादे ने मेरी जान निकाल दी।"* *सहारे इंसान को खोखला कर देते है और उम्मीदें कमज़ोर कर देती है अपनी ताकत के बल पर जीना शुरू कीजिए,खुद की सहन शक्ति,ख़ुद की ख़ूबी पर भरोसा करना सीखें"* *आपका,आपसे अच्छा साथी,दोस्त,गुरु,और हमदर्द कोई नही हो सकता*
एक दिन राजा भोज गहरी निद्रा में सोये हुए थे। उन्हें उनके स्वप्न में एक अत्यंत तेजस्वी वृद्ध पुरुष के दर्शन हुए। राजन ने उनसे पुछा- “महात्मन! आप कौन हैं?” वृद्ध ने कहा- “राजन मैं सत्य हूँ और तुझे तेरे कार्यों का वास्तविक रूप दिखाने आया हूँ। मेरे पीछे-पीछे चल आ और अपने कार्यों की वास्तविकता को देख!” राजा भोज उस वृद्ध के पीछे-पीछे चल दिए। राजा भोज बहुत दान, पुण्य, यज्ञ, व्रत, तीर्थ, कथा-कीर्तन करते थे, उन्होंने अनेक तालाब, मंदिर, कुँए, बगीचे आदि भी बनवाए थे। राजा के मन में इन कार्यों के कारण अभिमान आ गया था। वृद्ध पुरुष के रूप में आये सत्य ने राजा भोज को अपने साथ उनकी कृतियों के पास ले गए। वहाँ जैसे ही सत्य ने पेड़ों को छुआ, सब एक-एक करके सूख गए, बागीचे बंज़र भूमि में बदल गए । राजा इतना देखते ही आश्चर्यचकित रह गया।। फिर सत्य राजा को मंदिर ले गया। सत्य ने जैसे ही मंदिर को छुआ, वह खँडहर में बदल गया। वृद्ध पुरुष ने राजा के यज्ञ, तीर्थ, कथा, पूजन, दान आदि के लिए बने स्थानों, व्यक्तियों, आदि चीजों को ज्यों ही छुआ, वे सब राख हो गए।।राजा यह सब देखकर विक्षिप्त-सा हो गया। सत्य ने कहा-“ राजन! यश की इच्छा के लिए जो कार्य किये जाते हैं, उनसे केवल अहंकार की पुष्टि होती है, धर्म का निर्वहन नहीं।। सच्ची सदभावना से निस्वार्थ होकर कर्तव्यभाव से जो कार्य किये जाते हैं, उन्हीं का फल पुण्य के रूप मिलता है और यह पुण्य फल का रहस्य है।” इतना कहकर सत्य अंतर्धान हो गए। राजा ने निद्रा टूटने पर गहरा विचार किया और सच्ची भावना से कर्म करना प्रारंभ किया ,जिसके बल पर उन्हें ना सिर्फ यश-कीर्ति की प्राप्ति हुए बल्कि उन्होंने बहुत पुण्य भी कमाया। मित्रों , सच ही तो है , सिर्फ प्रसिद्धि और आदर पाने के नज़रिये से किया गया काम पुण्य नहीं देता। हमने देखा है कई बार लोग सिर्फ अखबारों और न्यूज़ चैनल्स पर आने के लिए झाड़ू उठा लेते हैं या किसी गरीब बस्ती का दौरा कर लेते हैं , ऐसा करना पुण्य नहीं दे सकता, असली पुण्य तो हृदय से की गयी सेवा से ही उपजता है , फिर वो चाहे हज़ारों लोगों की की गयी हो या बस किसी एक व्यक्ति की।
सर्दी का मौसम था। एक राजा अपने महल की खिड़की से बाहर का दृश्य देख रहा था। शाम ढलने को थी। तभी एक साधु आया और महल के सामने एक पेड़ के नीचे बैठ गया। उसके बदन पर एक लंगोटी को छोड़कर और कोई कपड़ा नहीं था। राजा को उस पर दया आ गई। राजा ने तुरंत एक नौकर के हाथ कुछ गरम कपड़े साधु के पास भेज दिए। थोड़ी देर बाद राजा ने फिर बाहर झांका। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। साधु अब भी नंगे बदन बैठा था। राजा ने सोचा- साधु को अपने तप का घमंड है, इसलिए उसने कपड़ों का तिरस्कार किया। राजा को क्रोध आया पर उसने नियंत्रण रखा। तभी अंधेरा घिर आया। राजा ने खिड़की बंद कर दी। थोड़ी देर बाद वह सो गया। सुबह राजा घूमने निकला तो ठिठक गया। नंगे बदन साधु अब भी पेड़ के नीचे मौजूद था। राजा ने पूछा- कहिए, रात कैसी कटी? साधु बोला-कुछ आप जैसी कटी और कुछ आप से अच्छी कटी। यह सुनकर राजा बोला-महाराज! आप की बात मेरी समझ में नहीं आई। साधु बोला- आपने समझा होगा कि मैंने आपकी भेंट का अपमान किया, पर ऐसी बात नहीं थी। एक गरीब आदमी सर्दी से कांपता हुआ जा रहा था। वे कपड़े मैंने उसे दे दिए। परहित में जो सुख है, उसके आगे सर्दी का क्या भय! जब तक मैं जागता रहा, भगवान का भजन करता रहा। आपको उस समय भी दुनिया भर की चिंताए घेरे हुए थीं। इसलिए मेरा वह समय आप से अच्छा कटा। जब हम दोनों सो रहे थे, हम दोनों बराबर थे। राजा लज्जित होकर वापस लौट गया।