आलेख

हम सबका सर्वोच्च उद्देश्य है सुखी रहना। जीवन के हर पल को सुख से भरना। पर यह भी है शाश्वत कि हर-एक के जीवन में दुःख अवश्य देता है दस्तक। कभी-कभी तो दुःख का हथौड़ा इतनी भारी लगता है कि जीवन में सब कुछ फीका दिखाई देता है। क्योंकि दुःख सहन करने की हमारी मानसिकता नहीं होती। इसीलिए मामूली दुःख भी पहाड़ जैसा लगता है। यदि दुःख से ऊपर उठना चाहते हैं तो पहले सुख से उपर उठना होगा। यह मान कर चलें कि सुख-दुःख है एक दूसरे की परछाई। यह अमीर से अमीर के पास भी उतना ही होता है, जितना गरीब के पास। *लेकिन अमीर छोटे दुःख में भी* *कर लेते हैं बड़े दुःख का अहसास।* दुःख से ऊपर उठे रहने का है एक ही मूल मंत्र , कि हम सुख को पकड़े रखने की मानसिकता को छोड़ें। समभाव से नाता जोड़ें। वैसे भी सुख और दुःख बाहर से नहीँ आते, हम इन्हें मन की कोरी कल्पना में ही संजोते रहते। मन अनावश्यक ही किसी बात को सोच कर होता रहता है सुखी दु:खी। छोटी सी बात हृदय में जमाए रखनी होगी कि जब हमारे पास हो सुख ही सुख, उस समय सोचते रहें कि कभी न कभी आने वाला है दुख। सोचिये ! एक छोटा सा सुख हमें खुशनुमा अहसास दिलाकर आह्लादित कर देता है, तो दुःख हमें कितना विचलित कर सकता है। *इसलिए सुख में, अनासक्त भाव* *में रहना आ गया तो समझो* *दुःख से ऊपर उठना आ गया।
एक दिन फकीर के घर रात चोर घुसे। घर में कुछ भी न था। सिर्फ एक कंबल था, जो फकीर ओढ़े लेटा हुआ था। सर्द रात, फकीर रोने लगा, क्योंकि घर में चोर आएं और चुराने को कुछ नहीं है, इस पीड़ा से रोने लगा। उसकी सिसकियां सुन कर चोरों ने पूछा कि भई क्यों रोते हो? फकीर बोला कि आप आए थे - जीवन में पहली दफा, यह सौभाग्य तुमने दिया! मुझ फकीर को भी यह मौका दिया! लोग फकीरों के यहां चोरी करने नहीं जाते, सम्राटों के यहां जाते हैं। तुम चोरी करने क्या आए, तुमने मुझे सम्राट बना दिया। ऐसा सौभाग्य! लेकिन फिर मेरी आंखें आंसुओ से भर गई हैं, सिसकियां निकल गईं, क्योंकि घर में कुछ है नहीं। तुम अगर जरा दो दिन पहले खबर कर देते तो मैं इंतजाम कर रखता दो—चार दिन का समय होता तो कुछ न कुछ मांग—तूंग कर इकट्ठा कर लेता। अभी तो यह कंबल भर है मेरे पास, यह तुम ले जाओ। और देखो इनकार मत करना। इनकार करोगे तो मेरे हृदय को बड़ी चोट पहुंचेगी। चोर घबरा गए, उनकी कुछ समझ में नहीं आया। ऐसा आदमी उन्हें कभी मिला नहीं था। चोरी तो जिंदगी भर की थी, मगर ऐसे आदमी से पहली बार मिलना हुआ था। *भीड़— भाड़ बहुत है, आदमी कहां?* *शक्लें हैं आदमी की, आदमी कहां?* पहली बार उनकी आंखों में शर्म आई, और पहली बार किसी के सामने नतमस्तक हुए। मना करके इसे क्या दुख देना, कंबल तो ले लिया। लेना भी मुश्किल! क्योंकि इस के पास कुछ और है भी नहीं, कंबल लिया तो पता चला कि फकीर नंगा है। कंबल ही ओढ़े हुए था, वही एकमात्र वस्त्र था— वही ओढ़नी, वही बिछौना। लेकिन फकीर ने कहा. तुम मेरी फिकर मत करो, मुझे नंगे रहने की आदत है। फिर तुम आए, सर्द रात, कौन घर से निकलता है। कुत्ते भी दुबके पड़े हैं। तुम चुपचाप ले जाओ और दुबारा जब आओ मुझे खबर कर देना। चोर तो ऐसे घबरा गए और एकदम निकल कर झोपड़ी से बाहर हो गए। जब बाहर हो रहे थे तब फकीर चिल्लाया कि सुनो, कम से कम दरवाजा बंद करो और मुझे धन्यवाद दो। आदमी अजीब है, चोरों ने सोचा। कुछ ऐसी कड़कदार उसकी आवाज थी कि उन्होंने उसे धन्यवाद दिया, दरवाजा बंद किया और भागे। फकीर खिड़की पर खड़े होकर दूर जाते उन चोरों को देखता रहा। *कोई व्यक्ति नहीं है ईश्वर जैसा, लेकिन सभी व्यक्तियों के भीतर जो धड़क रहा है, जो प्राणों का मंदिर बनाए हुए विराजमान है, जो श्वासें ले रहा है, वही तो ईश्वर है।* कुछ समय बाद वो चोर पकड़े गए। अदालत में मुकदमा चला, वह कंबल भी पकड़ा गया। और वह कंबल तो जाना—माना कंबल था। वह उस प्रसिद्ध फकीर का कंबल था। जज तत्‍क्षण पहचान गया कि यह उस फकीर का कंबल है। तो तुमने उस फकीर के यहां से भी चोरी की है? फकीर को बुलाया गया। और जज ने कहा कि अगर फकीर ने कह दिया कि यह कंबल मेरा है और तुमने चुराया है, तो फिर हमें और किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। उस आदमी का एक वक्तव्य, हजार आदमियों के वक्तव्यों से बड़ा है। फिर जितनी सख्त सजा मैं तुम्हें दे सकता हूं दूंगा। चोर तो घबरा रहे थे, काँप रहे थे जब फकीर अदालत में आया। और फकीर ने आकर जज से कहा कि नहीं, ये लोग चोर नहीं हैं, ये बड़े भले लोग हैं। मैंने कंबल भेंट किया था और इन्होंने मुझे धन्यवाद दिया था। और जब धन्यवाद दे दिया, बात खत्म हो गई। मैंने कंबल दिया, इन्होंने धन्यवाद दिया। इतना ही नहीं, ये इतने भले लोग हैं कि जब बाहर निकले तो दरवाजा भी बंद कर गए थे। जज ने तो चोरों को छोड़ दिया, क्योंकि फकीर ने कहा. इन्हें मत सताओ, ये प्यारे लोग हैं, अच्छे लोग हैं, भले लोग हैं। चोर फकीर के पैरों पर गिर पड़े और उन्होंने कहा हमें दीक्षित करो। वे संन्यस्त हुए। और फकीर बाद में खूब हंसा। और उसने कहा कि तुम संन्यास में प्रवेश कर सको इसलिए तो कंबल भेंट दिया था। इसे तुम पचा थोड़े ही सकते थे। इस कंबल में मेरी सारी प्रार्थनाएं बुनी थी। झीनी—झीनी बीनी रे चदरिया उस फकीर ने कहा प्रार्थनाओं से बुना था इसे। इसी को ओढ़ कर ध्यान किया था। इसमें मेरी समाधि का रंग था, गंध थी। तुम इससे बच नहीं सकते थे। यह मुझे पक्का भरोसा था, कंबल ले ही आएगा तुमको उस दिन चोर की तरह आए थे आज शिष्य की तरह आए। मुझे भरोसा था। क्योंकि बुरा कोई आदमी है ही नहीं।।।
एक गाय घास चरने के लिए एक जंगल में चली गई। शाम ढलने के करीब थी। उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पांव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी। वह बाघ भी उसके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तालाब दिखाई दिया। घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया। तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था। उसमें पानी कम था और वह कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों के बीच की दूरी काफी कम हुई थी। लेकिन अब वह कुछ नहीं कर पा रहे थे। वह गाय उस किचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। वह बाघ भी उसके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं सका। वह भी धीरे-धीरे कीचड़ के अंदर धंसने लगा। दोनों भी करीब करीब गले तक उस कीचड़ के अंदर फस गए। दोनों हिल भी नहीं पा रहे थे। गाय के करीब होने के बावजूद वह बाघ उसे पकड़ नहीं पा रहा था। थोड़ी देर बाद गाय ने उस बाघ से पूछा, क्या तुम्हारा कोई गुरु या मालिक है? बाघ ने गुर्राते हुए कहा, मैं तो जंगल का राजा हूं। मेरा कोई मालिक नहीं। मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं। गाय ने कहा, लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है? उस बाघ ने कहा, तुम भी तो फस गई हो और मरने के करीब हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरे जैसी है। गाय ने मुस्कुराते हुए कहा, बिलकुल नहीं। मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जाएगा। तुम्हें कौन ले जाएगा? थोड़ी ही देर में सच में ही एक आदमी वहां पर आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया। जाते समय गाय और उसका मालिक दोनों एक दूसरे की तरफ कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे, क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था। *गाय समर्पित ह्रदय का प्रतीक है। बाघ अहंकारी मन है और मालिक ईश्वर का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है और यह संघर्ष अस्तित्व की लड़ाई है। किसी पर निर्भर नहीं होना अच्छी बात है, लेकिन मैं ही सब कुछ हूं, मुझे किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, यही अहंकार है, और यहीं से विनाश का बीजारोपण हो जाता है।* *ईश्वर से बड़ा इस दुनिया में सच्चा हितैषी कोई नहीं होता, क्यौंकि वही अनेक रूपों से हमारी रक्षा करता है।*
अगर किसी के साथ ने अच्छा वक्त दिखाया है तो बुरे वक्त में उसका साथ छोड़ देना ठीक नहीं। . एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था। . पर निशाना चूक गया। तीर हिरण की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा। . पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए। . पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया, बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता। . दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर कांटा हुआ जा रहा था। . बात देवराज इंद्र तक पहुंची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इंद्र स्वयं वहां आए। . धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया। . इंद्र ने कहा, देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल, न फल। अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे, बचने की भी कोई उम्मीद नहीं है। . जंगल में कई ऐसे पेड़ हैं, जिनके बड़े-बड़े कोटर पत्तों से ढके हैं। पेड़ फल-फूल से भी लदे हैं। . *वहां से सरोवर भी पास है। तुम इस पेड़ पर क्या कर रहे हो, वहां क्यों नहीं चले जाते ?* . *तोते ने जवाब दिया, देवराज, मैं इसी पर जन्मा, इसी पर बढ़ा, इसके मीठे फल खाए।* . __*इसने मुझे दुश्मनों से कई बार बचाया। इसके साथ मैंने सुख भोगे हैं। आज इस पर बुरा वक्त आया तो मैं अपने सुख के लिए इसे त्याग दूं ?__* . *जिसके साथ सुख भोगे, दुख भी उसके साथ भोगूंगा, मुझे इसमें आनंद है।* . _*आप देवता होकर भी मुझे ऐसी बुरी सलाह क्यों दे रहे हैं ? यह कह कर तोते ने तो जैसे इंद्र की बोलती ही बंद कर दी।*_ . *तोते की दो-टूक सुन कर इंद्र प्रसन्न हुए* . _बोल, मैं तुमसे प्रसन्न हूं, कोई वर मांग लो।_ . _*तोता बोला, मेरे इस प्यारे पेड़ को पहले की तरह ही हरा-भरा कर दीजिए।*_ . *देवराज ने पेड़ को न सिर्फ अमृत से सींच दिया, बल्कि उस पर अमृत बरसाया भी।* . *पेड़ में नई कोंपलें फूटीं। वह पहले की तरह हरा हो गया, उसमें खूब फल भी लग गए।* . *तोता उस पर बहुत दिनों तक रहा, मरने के बाद देवलोक को चला गया।* . *युधिष्ठिर को यह कथा सुना कर भीष्म बोले, अपने आश्रयदाता के दुख को जो अपना दुख समझता है, उसके कष्ट मिटाने स्वयं ईश्वर आते हैं।* . *बुरे वक्त में व्यक्ति भावनात्मक रूप से कमजोर हो जाता है। जो उस समय उसका साथ देता है, उसके लिए वह अपने प्राणों की बाजी लगा देता है।* . *किसी के सुख के साथी बनो न बनो, दुख के साथी जरूर बनो।*
एक लड़की ने अपने पिता से पूंछा - पापा मैं अपने शरीर के कितने हिस्से को ढकूं और कितने हिस्से को खुला छोड़ दूं ? पिता का बड़ा खूबसूरत जबाब मिला - बेटा जितने हिस्से पर तुम नर्क की आग सहन कर सको उतना हिस्सा खुला छोड़ दो,, लड़की बोली- ऐसा क्यों पापा ?🤔🤔 पापा- क्योंकि पर्दा करना बहुत जरूरी है क्योंकि तुमने श्री कृष्ण की गोपियों के कपड़े चुराने बाली कहानी तो सुनी होगी जब गोपियां तालाब में निर्वस्त्र होकर नहाती थी तो भगवान श्री कृष्ण गोपियों के कपड़े उठा ले जाते थे और उनको परेशान करते थे वो ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि वो नही चाहते थे कि कोई भी स्त्री बिना कपड़ों के नहाये,, क्योंकि गोपियों को इंसान के अलावा जीव जंतु पशु पक्षी मछली व अन्य जानवर भी देखते थे,, जिसका ज्ञान गोपियों को नही था,, इसलिए वो बिना कपड़ों के नहाने के लिए मना करते थे व स्त्री को पर्दे में रहने की शिक्षा देते थे, लेकिन कुछ लोगो ने इसका उल्टा अर्थ निकाल लिया,, लड़की बोली - पापा अगर में पर्दा करूँगी तो खूबसूरत कैसे दिखूंगी ?🤷‍♀🤷‍♀👸👰 पिता - इसका जबाब में बेटा बाद में दूंगा,, कुछ दिन बाद पिता काम से विदेश चला गया,, और वहाँ से उसने लड़की के लिये गिफ्ट भेजा,,🎁🎁 लड़की ने गिफ्ट खोला उसमे एप्पल का मोबाइल था,,📱📱 पिता का फोन आया - बेटा गिफ्ट कैसा लगा ? लड़की - बहुत अच्छा पिता - बेटा अब क्या करोगे लड़की - सबसे पहले मैं इस फोन का स्क्रीनगार्ड और कबर ख़रीदूंगी पिता - इससे क्या होगा ? लड़की - इससे फोन सेफ रहेगा पिता- क्या ये सब लगाना जरूरी है ? लड़की - हां पापा बहुत जरूरी है पिता - क्या ऐप्पल कंपनी के मालिक ने ये लगाने के लिए बोला है ? लड़की - हा पापा बॉक्स में इंस्ट्रक्सन लिखे है कि ये जरूर लगाएं पिता - इनको लगाने से फोन खराब तो नही दिखेगा ? लड़की - नही पापा इसको लगाने से मेरा फोन और ज्यादा खूबसूरत दिखने लगेगा,, पिता - बेटा जब एक मोबाइल की सेफ्टी और खूबसूरत दिखने के लिए इस्क्रीनगार्ड और कबर बहुत इम्पोर्टेन्ट है। तो बेटा तुम तो उस ईश्वर की नायाब रचना हो,, तुम्हारी सेफ्टी और खूबसूरती के लिये ही उसने पर्दा करने को कहा है,, जब इस्क्रीनगार्ड और कबर से मोबाइल खूबसूरत हो जाता है उसी प्रकार पर्दा करने से तुम भी और ज्यादा खूबसूरत दिखोगी और सब तुम्हारी इज्ज़त भी करेंगे,, ,,शरीर खुला रखने से नही ढकने से खूबसूरती आती है,, और ये केवल तुम पर नही हर इंसान पर लागू होता है वो चाहे स्त्री हो या पुरुष,, अगर हम लोग भी निर्वस्त्र होकर घूमने लगे तो जानवरों और हममें कोई फर्क नही, और न ही हमे खुद को बुद्दिजीवी कहने का अधिकार है,, बेटी की आखों के आंसू थे 😭😭 आज पिता ने अपनी बेटी को जिंदगी की एक महत्वपूर्ण शिक्षा दे दी,,, अगर आप को इस कहानी से प्रेरणा मिली हो तो अपने परिवार में अपने बच्चों को सुनाए और अन्य लोगो को भी भेजें....✍🙏🙏
बहुत समय पहले की बात है किसी गाँव में मोहन नाम का एक किसान रहता था।वह बड़ा मेहनती और प्रामाणिक थाlअपने अच्छे व्यवहार के कारण दूर -दूर तक उसे लोग जानते थे और उसकी प्रशंसा करते थेlपर एक दिन जब शाम वह खेतों से काम कर लौट रहा था तभी रास्ते में उसने कुछ लोगों को बाते करते सुना,वे उसी के बारे में बात कर रहे थेlमोहन अपनी प्रशंसा सुनने के लिए उन्हें बिना बताये धीरे-धीरे उनके पीछे चलने लगा,पर उसने उनकी बात सुनी तो पाया कि वे उसकी बुराई कर रहे थे, कोई कह रहा था कि,मोहन घमण्डी है,तो कोई कह रहा था कि,सब जानते हैं वो अच्छा होने का दिखावा करता है।मोहन ने इससे पहले मात्र अपनी प्रशंसा सुनी थी पर इस घटना का उसके दिमाग पर बहुत बुरा असर पड़ा और अब वह जब भी कुछ लोगों को बाते करते देखता तो उसे लगता वे उसकी बुराई कर रहे हैं। यहाँ तक कि अगर कोई उसकी प्रशंसा करता तो भी उसे लगता कि उसका मजाक उड़ाया जा रहा हैlधीरे -धीरे सभी ये अनुभव करने लगे कि मोहन बदल गया है,और उसकी पत्नी भी अपने पति के व्यवहार में आये बदलाव से दुखी रहने लगी और एक दिन उसने पूछा“आज कल आप इतने परेशान क्यों रहते हैं,कृपया मुझे इसका कारण बताइये। 👉मोहन ने उदास होते हुए उस दिन की बात बता दी,पत्नी को भी समझ नहीं आया कि क्या किया जाए पर तभी उसे ध्यान आया कि पास के ही एक गाँव में एक सिद्ध महात्मा हैं,और वो बोली,मुझे पता चला है कि पड़ोस के गाँव में एक पहुंचे हुए संत है।चलिये हम उनसे कोई समाधान पूछते हैlअगले दिन वे महात्मा जी के शिबीर में पहुंचेl मोहन ने सारी घटना बतायी और बोला,महाराज उस दिन के बाद से सभी मेरी बुराई और झूठी प्रशंसा करते हैं,कृपया मुझे बताइये कि मैं वापस अपनी साख कैसे बना सकता हूँ!”महात्मा मोहन कि समस्या समझ चुके थे।“पुत्र तुम अपनी पत्नी को घर छोड़ आओ और आज रात मेरे शिविर में ठहरो,”महात्मा कुछ सोचते हुए बोले,मोहन ने ऐसा ही किया,पर जब रात में सोने का समय हुआ तो अचानक ही मेंढ़कों के टर्र -टर्र की आवाज आने लगीlमोहन बोला,“ये क्या महाराज यहाँ इतना कोलाहल क्यों है?”पुत्र,पीछे एक तालाब है,रात के समय उसमे मौजूद मेंढक अपना राग अलापने लगते हैं!”पर ऐसे में तो कोई यहाँ सो नहीं सकता?”मोहन ने चिंता जताई।“हाँ बेटा,पर तुम ही बताओ हम क्या कर सकते है?हो सके तो तुम हमारी मदद करो“,महात्मा जी बोलेl मोहन बोला,“ठीक है महाराज,इतना शोर सुनके लगता है इन मेंढकों की संख्या हज़ारों में होगी,मैं कल ही गांव से ८/१० मजदूरों को लेकर आता हूँ और इन्हे पकड़ कर दूर नदी में छोड़ आता हूँ। 👉और अगले दिन मोहन सुबह -सुबह मजदूरों के साथ वहाँ पहुँचा,महात्मा जी भी वहीँ खड़े सब कुछ देख रहे थेlतालाब ज्यादा बड़ा नहीं था,८/१० मजदूरों ने चारों और से जाल डाला और मेंढ़कों को पकड़ने लगे थोड़ी देर की ही मेहनत में सारे मेंढक पकड़ लिए गए,जब मोहन ने देखा कि कुल मिला कर ५०/६० ही मेंढक पकडे गए है। तब उसने महात्मा जी से पूछा, “महाराज,कल रात तो इसमें हज़ारों मेंढक थे,भला आज वे सब कहाँ चले गए,यहाँ तो बस मुट्ठीभर मेंढक ही बचे हैं।महात्मा जी गम्भीर होते हुए बोले,“कोई मेंढक कहीं नहीं गया,तुमने कल इन्ही मेंढ़कों की आवाज सुनी थी, ये मुट्ठीभर मेंढक ही इतना शोर कर रहे थे तुम्हे लगा हज़ारों मेंढक टर्र-टर्र कर रहे है।पुत्र,इसी प्रकार जब तुमने कुछ लोगों को अपनी बुराई करते सुना तो तुम भी यही गलती कर बैठे,तुम्हे लगा कि हर कोई तुम्हारी बुराई करता है पर सच्चाई ये है कि बुराई करने वाले लोग मुठ्ठीभर मेंढक के समान ही थे।इसलिए अगली बार किसी को अपनी बुराई करते सुनना तो इतना याद रखना कि हो सकता है ये कुछ ही लोग हों जो ऐसा कर रहे हो और इस बात को भी समझना कि भले तुम कितने ही अच्छे क्यों न हो ऐसे कुछ लोग होंगे ही होंगे जो तुम्हारी बुराई करेंगे।”अब मोहन को अपनी गलती का अहसास हो चुका था, वह पुनः पुराना वाला मोहन बन चुका था,मोहन की तरह हमें भी कुछ लोगों के व्यवहार को हर किसी का व्यवहार नहीं समझ लेना चाहिए और positive frame of mind से अपनी ज़िन्दगी जीनी चाहिए।हम कुछ भी कर लें पर जीवन में कभी ना कभी ऐसी समस्या आ ही जाती है जो रात के अँधेरे में ऐसी लगती है मानो हज़ारों मेंढक कान में टर्र-टर्र कर रहे हों।पर जब दिन के उजाले में हम उसका समाधान करने का प्रयास करते हैं तो वही समस्या छोटी लगने लगती है. इसलिए हमें ऐसी situations में घबराने की बजाये उसका solution खोजने का प्रयास करना चाहिए और कभी भी मुट्ठी भर मेंढकों से घबराना नहीं चाहिए। *✍काल्पनिक कथाएं* *🔴जैनम् जयतु शासनम् वंदे श्री वीरशासनम्🔴*
एक दंपती दीपावली की ख़रीदारी करने को हड़बड़ी में था । पति ने पत्नी से कहा, "ज़ल्दी करो, मेरे पास टाईम नहीं है ।" कह कर कमरे से बाहर निकल गया । तभी बाहर लॉन में बैठी माँ पर उसकी नज़र पड़ी । कुछ सोचते हुए वापस कमरे में आया और अपनी पत्नी से बोला, "शालू, तुमने माँ से भी पूछा कि उनको दिवाली पर क्या चाहिए ? शालिनी बोली, "नहीं पूछा... अब उनको इस उम्र में क्या चाहिए होगा यार, दो वक्त की रोटी और दो जोड़ी कपड़े... इसमें पूछने वाली क्या बात है ? यह बात नहीं है शालू... माँ पहली बार दिवाली पर हमारे घर में रुकी हुई है । वरना तो हर बार गाँव में ही रहती हैं । तो... औपचारिकता के लिए ही पूछ लेती । अरे इतना ही माँ पर प्यार उमड़ रहा है तो ख़ुद क्यों नहीं पूछ लेते ? झल्लाकर चीखी थी शालू ... और कंधे पर हैंड बैग लटकाते हुए तेज़ी से बाहर निकल गयी । सूरज माँ के पास जाकर बोला, "माँ, हम लोग दिवाली की ख़रीदारी के लिए बाज़ार जा रहे हैं । आपको कुछ चाहिए तो... माँ बीच में ही बोल पड़ी, "मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा" सोच लो माँ, अगर कुछ चाहिये तो बता दीजिए... सूरज के बहुत ज़ोर देने पर माँ बोली, "ठीक है, तुम रुको, मैं लिख कर देती हूँ । तुम्हें और बहू को बहुत ख़रीदारी करनी है, कहीं भूल न जाओ ।" कहकर सूरज की माँ अपने कमरे में चली गई । कुछ देर बाद बाहर आई और लिस्ट सूरज को थमा दी... सूरज ड्राइविंग सीट पर बैठते हुए बोला, "देखा शालू, माँ को भी कुछ चाहिए था, पर बोल नहीं रही थीं । मेरे ज़िद करने पर लिस्ट बना कर दी है । इंसान जब तक ज़िंदा रहता है, रोटी और कपड़े के अलावा भी बहुत कुछ चाहिये होता है ।" अच्छा बाबा ठीक है, पर पहले मैं अपनी ज़रूरत का सारा सामान लूँगी । बाद में आप अपनी माँ की लिस्ट देखते रहना । कहकर शालिनी कार से बाहर निकल गयी । पूरी ख़रीदारी करने के बाद शालिनी बोली, "अब मैं बहुत थक गयी हूँ, मैं कार में A.C. चालू करके बैठती हूँ, आप अपनी माँ का सामान देख लो ।" अरे शालू, तुम भी रुको, फिर साथ चलते हैं, मुझे भी ज़ल्दी है । देखता हूँ माँ ने इस दिवाली पर क्या मँगाया है ? कहकर माँ की लिखी पर्ची ज़ेब से निकालता है । बाप रे..!! इतनी लंबी लिस्ट...? शालिनी : पता नहीं क्या - क्या मँगाया होगा ? ज़रूर अपने गाँव वाले छोटे बेटे के परिवार के लिए बहुत सारे सामान मँगाये होंगे । और बनो "श्रवण कुमार" कहते हुए शालिनी गुस्से से सूरज की ओर देखने लगी । पर ये क्या ? सूरज की आँखों में आँसू... और लिस्ट पकड़े हुए हाथ सूखे पत्ते की तरह हिल रहा था... पूरा शरीर काँप रहा था । शालिनी बहुत घबरा गयी । क्या हुआ, ऐसा क्या माँग लिया है तुम्हारी माँ ने ? कहकर सूरज के हाथ से पर्ची झपट ली... हैरान थी शालिनी भी... इतनी बड़ी पर्ची में बस चंद शब्द ही लिखे थे... *पर्ची में लिखा था...* "बेटा सूरज मुझे दिवाली पर तो क्या किसी भी अवसर पर कुछ नहीं चाहिए । फिर भी तुम ज़िद कर रहे हो तो... तुम्हारे शहर की किसी दुकान में अगर मिल जाए तो *फ़ुरसत के कुछ पल* मेरे लिए लेते आना... ढलती हुई साँझ हूँ अब मैं सूरज..!! मुझे गहराते अँधियारे से डर लगने लगा है, बहुत डर लगता है । पल-पल मेरी तरफ़ बढ़ रही मौत को देखकर... जानती हूँ टाला नहीं जा सकता, शाश्वत सत्‍य है... पर अकेलेपन से बहुत घबराहट होती है सूरज..!! तो जब तक तुम्हारे घर पर हूँ, कुछ पल बैठा कर मेरे पास, कुछ देर के लिए ही सही बाँट लिया कर मेरे बुढ़ापे का अकेलापन... बिन दीप जलाए ही रौशन हो जाएगी मेरी जीवन की साँझ... कितने साल हो गए बेटा तुझे स्पर्श नहीं किया... एक बार फिर से, आ मेरी गोद में सर रख और मैं ममता भरी हथेली से सहलाऊँ तेरे सर को... एक बार फिर से इतराए मेरा हृदय, मेरे अपनों को क़रीब, बहुत क़रीब पाकर... और मुस्कुरा कर मिलूँ मौत के गले... क्या पता अगली दिवाली तक रहूँ ना रहूँ... पर्ची की आख़िरी लाइन पढ़ते-पढ़ते शालिनी फफक-फफक कर रो पड़ी... *ऐसी ही होती हैं माँ...* दोस्तो, अपने घर के उन विशाल हृदय वाले लोगों, जिनको आप बूढ़े और बुढ़िया की श्रेणी में रखते हैं, वे आपके जीवन के कल्पतरु हैं । उनका यथोचित आदर-सम्मान, सेवा-सुश्रुषा और देखभाल करें । यक़ीन मानिए, आपके भी बूढ़े होने के दिन नज़दीक ही हैं... उसकी तैयारी आज से ही कर लें । इसमें कोई शक़ नहीं, आपके अच्छे-बुरे कृत्य देर-सवेर आप ही के पास लौट कर आने हैं..!! *कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया अग्रसारित अवश्य कीजिए । शायद किसी का हृदय परिवर्तन हो जाऐ...* 🙏🏻💖💐💝👏🏻

🐿एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी❗ गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी❗ क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था❗ गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी , कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा❗ गिलहरी फिर काम पर लग जाती❗ गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता, और वो फिर काम पर लग जाती❗ *ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था❗* ऐसे ही समय बीतता रहा .... एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया❗ *गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के❓* पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे❗ *यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है❗* इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है❗ *60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है❗* तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है❗ क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : - *कितनी इच्छायें मरी होंगी❓* *कितनी तकलीफें मिली होंगी❓* *कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे❓* क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके❗ *इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके❗* इस लिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो❗ मौज लो, रोज लो❗ नहीं मिले तो खोज लो‼

🐿एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी❗ गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी❗ क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था❗ गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी , कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा❗ गिलहरी फिर काम पर लग जाती❗ गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता, और वो फिर काम पर लग जाती❗ *ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था❗* ऐसे ही समय बीतता रहा .... एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया❗ *गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के❓* पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे❗ *यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है❗* इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है❗ *60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है❗* तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है❗ क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : - *कितनी इच्छायें मरी होंगी❓* *कितनी तकलीफें मिली होंगी❓* *कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे❓* क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके❗ *इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके❗* इस लिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो❗ 🐿एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी❗ गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी❗ क्यों कि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था❗ गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी , कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा❗ गिलहरी फिर काम पर लग जाती❗ गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता, और वो फिर काम पर लग जाती❗ *ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था❗* ऐसे ही समय बीतता रहा .... एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया❗ *गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के❓* पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे❗ *यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है❗* इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है❗ *60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है❗* तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है❗ क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : - *कितनी इच्छायें मरी होंगी❓* *कितनी तकलीफें मिली होंगी❓* *कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे❓* क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके❗ *इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके❗* इस लिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो❗ मौज लो, रोज लो❗ नहीं मिले तो खोज लो‼ BUSY पर BE-EASY भी रहो❗
*एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी। एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी? सयाने हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे। दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी? तीसरा हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है। एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है। इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी? समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था। सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था। एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो। दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे। सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना। सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया। वरिष्ठजन घर की धरोहर हैं ।वे हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक है। जिस तरह आंगन में पीपल का वृक्ष फल नहीं देता, परंतु छाया अवश्य देता है। उसी तरह हमारे घर के बुजुर्ग हमे भले ही आर्थिक रूप से सहयोग नहीं कर पाते है, परंतु उनसे हमे संस्कार एवं उनके अनुभव से कई बाते सीखने को मिलती है,* *बड़े-बुजुर्ग परिवार की शान है वो कोई कूड़ा-करकट नहीं हैं, जिसे कि परिवार से बाहर निकाल फेंका जाए। अपने प्यार से रिश्तों को सींचने वाले इन बुजुगों को भी बच्चों से प्यार व सम्मान चाहिए अपमान व तिरस्कार नहीं। अपने बच्चों की खातिर अपना जीवन दाँव पर लगा चुके इन बुजुर्गों को अब अपनों के प्यार की जरूरत है। यदि हम इन्हें सम्मान व अपने परिवार में स्थान देंगे तो लाभान्वित ही होंगे । ऐसा न करने पर हम अपने हाथों अपने बच्चों को उस प्यार, संस्कार, आशीर्वाद व स्पर्श से वंचित कर रहे हैं, जो उनकी जिंदगी को सँवार सकता है। याद रखिए किराए से भले ही प्यार मिल सकता है परंतु संस्कार, आशीर्वाद व दुआएँ नहीं। यह सब तो हमें माँ-बाप से ही मिलती है
*एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पर बीसीयों हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे। एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी। एक युवा हंस हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी? सयाने हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से चिपक जाएगा, तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम मारे जाएंगे। दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी? तीसरा हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है। एक हंस बड़बड़ाया, यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है। इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल कहां थी? समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था। सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी। एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया। सांझ को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए। जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था। एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो। दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे। सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। वहां भी मरे समान पड़े रहना। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना। सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था। सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया अवाक होकर देखता रह गया। वरिष्ठजन घर की धरोहर हैं ।वे हमारे संरक्षक एवं मार्गदर्शक है। जिस तरह आंगन में पीपल का वृक्ष फल नहीं देता, परंतु छाया अवश्य देता है। उसी तरह हमारे घर के बुजुर्ग हमे भले ही आर्थिक रूप से सहयोग नहीं कर पाते है, परंतु उनसे हमे संस्कार एवं उनके अनुभव से कई बाते सीखने को मिलती है,* *बड़े-बुजुर्ग परिवार की शान है वो कोई कूड़ा-करकट नहीं हैं, जिसे कि परिवार से बाहर निकाल फेंका जाए। अपने प्यार से रिश्तों को सींचने वाले इन बुजुगों को भी बच्चों से प्यार व सम्मान चाहिए अपमान व तिरस्कार नहीं। अपने बच्चों की खातिर अपना जीवन दाँव पर लगा चुके इन बुजुर्गों को अब अपनों के प्यार की जरूरत है। यदि हम इन्हें सम्मान व अपने परिवार में स्थान देंगे तो लाभान्वित ही होंगे । ऐसा न करने पर हम अपने हाथों अपने बच्चों को उस प्यार, संस्कार, आशीर्वाद व स्पर्श से वंचित कर रहे हैं, जो उनकी जिंदगी को सँवार सकता है। याद रखिए किराए से भले ही प्यार मिल सकता है परंतु संस्कार, आशीर्वाद व दुआएँ नहीं। यह सब तो हमें माँ-बाप से ही मिलती है