विनयांजलि

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इस चेतना की तीर्थ को गुरु मां संभालिए आई हूं तेरी शरण में इसे मंदिर में ढालिए कर्म चक्र चक्षु से हमको निकालिए आई हूं शरण में मां मंदिर में ढालिए मेरा स्वभाव जल की भांति शुद्ध हो निर्मल सत्य शील क्षमा करुणा मन में हो प्रबल गुरु मां मुझे अपने शासन में पालिए आई हूं शरण में इसे मंदिर ..

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ें ढालिए गुरु शिष्य का संबंध ही शुभ का प्रबंध है गुरु का आचरण ही शिष्य के लिए सुग्रंथ है किंचित कृपा की डोर मेरी ओर डालिए इस चेतना के तीर्थ को मंदिर में ढालिए। ।।विज्ञाश्री माताजी को कोटि कोटि वंदन।।

19-02-2020 06:35 am
मोनिका जैन
गाजियाबाद

Anjali jain
Hazaribag

Anjali jain
Hazaribag

Rajkumar jain Temani
Malpura

लोग कहते हैं अगर हाथों की लकीरें अधूरी हो तो किस्मत अच्छी नहीं होती । लेकिन सिर पर हाथ गुरू मा का हो तो लकीरों की जरूरत नहीं होती नमन गुरू मा बारम्बार वनदामि